यूपी हो या तेलंगाना, महाराष्ट्र हो या छत्तीसगढ़, हर जगह सत्ता या निजी गिरोहों के हाथों ‘दलित’ क्यों मारा जा रहा है?
सोशल-वाणी

यूपी हो या तेलंगाना, महाराष्ट्र हो या छत्तीसगढ़, हर जगह सत्ता या निजी गिरोहों के हाथों ‘दलित’ क्यों मारा जा रहा है?

उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद में दलित LLB छात्र दिलीप सरोज की निर्मम हत्या कर दी गई। उसे दबंगों ने ईटों-पत्थरों से कुचलकर मार दिया।

दिन व दिन दलितों के खिलाफ बढ़ते हिंसक मामले सोचने पर मजबूर कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर तमाम चिंतकों ने इसपर गहरी चिंता व्यक्त की है।

पहले रोहित वेमुला फिर ऊना,सहारनपुर अब इलाहाबाद यह सब मामले एक जैसे लगते हैं। सब जगह उच्च जातियों की दंबगई के शिकार दलित पीड़ित नजर आते हैं।

पत्रकार उर्मिलेश उर्मिल ने लिखा कि, दिलीप सरोज की नृशंस हत्या अपने ‘लोकतंत्र’ का असल चेहरा उजागर करती है! राजनीतिक रूप से आजाद होने के बावजूद भारत ने सन् 47 से अब तक सामाजिक- आर्थिक बराबरी लाने के ठोस, सतत और समावेशी कदम नहीं उठाए, जिसका डॉ बी आर अम्बेडकर ने सन् 1950 में आह्वान किया था। इसलिए सत्ता और समाज पर वर्णवादी सामंतों, कारपोरेट घरानों और मनुवादी चरित्रों का वर्चस्व लगातार कायम रहा।

यूपी हो या तेलंगाना, महाराष्ट्र हो या छत्तीसगढ़, हर जगह सत्ता या निजी गिरोहों के हाथों कौन मारा जा रहा है? कौन सताया जा रहा है? भारतीय जेलों में बंद कैदियों की संख्या और उनकी सामाजिक पृष्ठभूमि देख लीजिए, चौंक जायेंगे। हमारा लोकतंत्र कागज में सजा दिखता है पर जमीन पर चारों तरफ फैली है, खूंखार निरंकुशता !

वहीं दिलीप मंडल लिखते हैं कि,

इस देश के हर नागरिक की जान कीमती है. यह बात बतानी ही होगी.

इलाहाबाद के दिलीप सरोज हत्याकांड का जैसा जबर्दस्त विरोध हुआ है, उससे भविष्य में कई दिलीप सरोज मारे जाने से बच जाएंगे.

ऐसी हर घटना का राष्ट्रीय स्तर पर विरोध होना चाहिए. मंत्रियों के इस्तीफे होने चाहिए. अफसरों की बर्खास्तगी होनी चाहिए. जैसे कि रोहित वेमुला कांड के बाद स्मृति ईरानी को मानव संसाधन मंत्री पद छोड़ना पड़ा. वाइस चांसलर को छुट्टी पर जाना पड़ा. जैसे की ऊना कांड के बाद बीजेपी की सीएम आनंदीबेन पटेल को इस्तीफा देना पड़ा.

जैसा चलता रहा है, वैसा नहीं चलेगा।

आपको बता दें कि, इलाहाबाद में दलित छात्र दिलीप सरोज की मामूली विवाद में हत्या कर दी गई।