कविता : हुज़ूर आये हैं जनाज़े पर और लोकतंत्र मरघट पर खड़ा है-ये संविधान की चीत्कार है
सोशल-वाणी

कविता : हुज़ूर आये हैं जनाज़े पर और लोकतंत्र मरघट पर खड़ा है-ये संविधान की चीत्कार है

आप हँसें कि तीर लगा है निशाने पर
आप हँसें कि ख़ुद बाइज़्ज़त बरी हुए
आप हँसें कि हुज़ूर आये हैं जनाज़े पर
आप हँसें कि लोकतंत्र मरघट पर खड़ा है।
आप हँसें कि आप भेड़चाल समझते हैं
आप हँसें कि ये तमाशबीनों का तमाशा है
आप हँसें कि वो बेटा था किसी और का
आप हँसें कि वो मिट गया बनकर ‘आंकड़ा’
आप हँसें कि आप ही तो सरकार हैं
आप हँसें कि आप ही सरताज हैं
आप हँसें कि ये मूर्खों की बस्ती है
आप हँसें कि जनता कुछ नहीं समझती है
आप हँसें कि संसद की अंगीठी सुलग गयी
आप हँसें कि देश हुआ है छावनी
आप हँसे कि ये जीत की जयजयकार है
आप हँसें कि ये संविधान की चित्कार है।

  • रीवा सिंह