पिछले साल के मुकाबले 50 गुना बढ़ा सरकारी बैंकों का घाटा, 307 करोड़ से बढ़कर हुआ 16600 करोड़
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पिछले साल के मुकाबले 50 गुना बढ़ा सरकारी बैंकों का घाटा, 307 करोड़ से बढ़कर हुआ 16600 करोड़

मौजूदा वित्त वर्ष की पहली तिमाही में 21पब्लिक सेक्टर बैंकों का कुल घाटा बढ़कर 16,600 करोड़ रुपये हो गया, जो सालभर पहले सिर्फ 307 करोड़ था।

भारतीय बैंकों की स्तिथि बिगड़ती जा रही है। और इनमें सबसे ज्यादा ख़राब हालात में सरकारी बैंक हैं। कर्ज़ की अदायगी ना होने और उस से नॉन परफोर्मिंग एसेट्स (एनपीए) लगातार बढ़ने से बैंक बेहाल हो चुके हैं।

मौजूदा वित्त वर्ष की पहली तिमाही में 21 पब्लिक सेक्टर बैंकों का कुल घाटा बढ़कर 16,600 करोड़ रुपये हो गया, जो सालभर पहले सिर्फ 307 करोड़ था। इसका पता रेग्युलेटरी फाइलिंग के डेटा से चला है। जून तिमाही में सिर्फ सात बैंकों ने लाभ दिया है जबकि साल भर पहले ऐसे 12 बैंक थे। मतलब घाटा पिछले साल के मुकाबले 50 गुना बढ़ चुका है।

बढ़ता एनपीए भारतीय बैंकों की लगातार कमर तोड़ रहा है। एन.पी.ए बैंकों का वो लोन होता है जिसके वापस आने की उम्मीद नहीं होता। इस कर्ज़ में 90% से ज़्यादा हिस्सा उद्योगपतियों का है।

अक्सर उद्योगपति बैंक से कर्ज़ लेकर खुद को दिवालिया दिखा देते हैं और उनका लोन एन.पी.ए में बदल जाता है। यही उस लोन के साथ होता है जिसे बिना चुकाए नीरव मोदी और विजय माल्या जैसे लोग देश छोड़कर भाग जाते हैं।

सरकारी बैंकों के एनपीए में भी पिछले कुछ सालों में इसी तरह का बढ़ोतरी देखी गई है। रिज़र्व बैंक ने बताया है कि देश के बैंकों का एनपीए 10 लाख करोड़ से ज्यादा हो चुका है। जबकि 2013-14 में ये 2 लाख 40 हज़ार करोड़ था। देश में लगभग 90% एनपीए सरकारी बैंकों का ही है।

इकरा के ग्रुप हेड फाइनैंशल सेक्टर रेटिंग्स कार्तिक श्रीनिवासन ने कहा, 'हमारा मानना है कि एनपीए पीक पर पहुंचने वाला है और इस साल के अंत तक एनपीए का लेवल घटता नजर आ सकता है। आरबीआई ने एनसीएलटी भेजे जानेवाले लोन अकाउंट्स के रेजॉलुशन की टाइमलाइन 6 से 9 महीने के बीच तय की है। अगर देरी भी होती है तो फाइनैंशल इयर के अंत तक रेजॉलुशन हो ही जाएंगे।'

एसबीआई के चेयरमैन रजनीश कुमार ने भी माना है कि मुसीबत अभी खत्म नहीं हुई है। उन्होंने कहा, 'सितंबर में हम प्रविजन कवरेज रेशियो बढ़ाना चाहते हैं ताकि दिसंबर में हमें पीछे मुड़कर देखना नहीं पड़े और पिछले एनपीए का घाव बचा नहीं रहे।'