त्रिपुरा में अलगाववादियों से गठबंधन करके भाजपा ने साबित कर दिया कि चुनाव जीतने के लिए वो कुछ भी कर सकती है
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त्रिपुरा में अलगाववादियों से गठबंधन करके भाजपा ने साबित कर दिया कि चुनाव जीतने के लिए वो कुछ भी कर सकती है

खुद को राष्ट्रवादी पार्टी बताने वाली भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) का राष्ट्रवाद त्रिपुरा में कमजोर पड़ गया। इसका कारण है राजनीतिक महात्वकांक्षा। बीजेपी अपनी राजनीतिक महत्वकांक्षा को पूरा करने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार नजर आ रही है।

ऐसे में बीजेपी को एक अवसरवादी पार्टी कहना गलत नहीं होगा! ऐसा इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि बीजेपी जो देश भर में अलगाववाद का विरोध करती है वो त्रिपुरा में अलगावादियों के साथ मिलकर चुनाव लड़ रही है। बता दें कि चुनाव आयोग नार्थ ईस्ट के तीन राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव के तारीखों का ऐलान कर चुकी है।

ये राज्य हैं- त्रिपुरा, मेधालय, नागालैंड। त्रिपुरा में मतदान 18 फरवरी को होना है। त्रिपुरा में पिछले 20 सालों से माणिक सरकार के नेतृत्व में CPIM सरकार चला रही है। बीजेपी किसी भी तरह CPIM के इस किले को भेदना चाहती है। और इस महत्वकांक्षा के एवज में बीजेपी अपनी कथित राष्ट्रवादी छवी को भी दाव पर लगाने को तैयार है। बीजेपी ने त्रिपुरा के अलगावादी पार्टी इंडिजेनस पीपल्स फ्रंट ऑफ़ त्रिपुरा (IPFT) से गठबंधन कर लिया है।

त्रिपुरा में कुल 60 विधानसभा सीट है, जिसमें से 51 पर बीजेपी चुनाव लड़ रही है और नौ पर उसकी सहयोगी पार्टी IPFT चुनाव लड़ रही है। एक तरफ RSS-BJP देश के नागरिकों को अखंड भारत का सपना दिखाती है, और दुसरी तरफ अलग अपने लिए राज्य की मांग करने IPFT से गठबंधन करती है। ऐसे में क्या बीजेपी अपने समर्थकों के साथ धोखा नहीं कर रही?

बिल्कुल कर रही है। क्योंकि सोशल मीडिया से लेकर सड़को तक RSS-BJP समर्थक अखंड भारत का दम भरते हैं और उनकी पार्टी बीजेपी अलगाववादियों के साथ मिलकर सरकार चलाने के फिराक में है। त्रिपुरा एक सीमावर्ती राज्य है बावजूद इसके IPFT अपने लिए अलग राज्य की मांग करती रही है। तो क्या बीजेपी सत्ता के लालच में देश के टुकरे करने को भी तैयारा है?

IPFT का इतिहास रक्तरंजित रहा है। पिछले साल सितंबर में रिपोर्टिंग के दौरान टीवी पत्र शांतनु भौमिक की हत्या कर दी गई थी, इस हत्या का आरोप IPFT पर ही लगा था। इस बार के चुनाव में शामिल होने वाले IPFT के नौवों उम्मीदवार पर आपराधिक मामाले दर्ज हैं। लेकिन बीजेपी को इससे भी कोई फर्क नहीं पड़ रहा। बीजेपी को बस किसी भी किमत पर चुनाव जितना है!