पहले माफ किया अडानी पर लगाया गया 200 करोड़ का जुर्माना, अब पर्यावरण को नुकसान होने से ही किया इनकार
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पहले माफ किया अडानी पर लगाया गया 200 करोड़ का जुर्माना, अब पर्यावरण को नुकसान होने से ही किया इनकार

scroll.in पर छपी एक खबर के मुताबिक, मोदी सरकार ने अडानी की कंपनी पर लगे फाइन को 2015 में कैंसिल कर दिया था और अब मामले में क्लीनचिट भी दे दिया है।

जब से मोदी सरकार बनी है उद्योगपति अडाणी पर कुछ ज्यादा ही मेहरबान है। गुजरात के कच्छ इलाके में मुंद्रा प्रोजेक्ट के तहत पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंचाने के आरोप में यूपीए-2 सरकार के दौरान 200 करोड़ का फाइन लगाया गया था जिसे सत्ता में आने के बाद मोदी सरकार ने कैंसिल कर दिया और अब पूरे मामले में अडानी की कंपनी को क्लीन चिट दे दिया गया है और निष्कर्ष निकाला गया कि कंपनी ने किसी भी तरह से ग्रीन रेगुलेशंस के मानकों को नहीं तोड़ा है। साथ ही अब पर्यावरण मंत्रालय प्रोजेक्ट के विस्तार प्रक्रिया पर काम कर रही है।

2013 में यूपीए की सरकार थी और तब पर्यावरण मंत्रालय की तरफ से अडाणी ग्रुप पर 200 करोड़ या प्रोजेक्ट की लागत का 1% फाइन लगाया गया था । आरोप था कि इस प्रोजेक्ट के दौरान पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंचाया गया है।

अगले साल ही 2014 में सत्ता परिवर्तन हुआ और अडाणी के प्रिय माने जाने वाले राजनेता नरेंद्र मोदी केंद्र की सत्ता संभालते हैं। उसके बाद सितंबर 2015 में भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार में पर्यावरण मंत्रालय ने पिछली सरकार के निर्णय से ठीक उलट निर्णय लिया और कहा कि सरकार इस तरह के कोई दंड नहीं लगा सकती है। कहा- किसी तरह के पर्यावरण के नुकसान हुआ है तो उसकी भरपाई के लिए कंपनी अलग से भरपाई करेगी।

जब 2016 में इसपर चौतरफा खबरें बनने लगी तो मिनिस्ट्री ने तर्क दिया कि पिछला फाइन हटाने का मतलब है कि नए और बड़े फाइन की संभावना बन सकती है। जितना पर्यावरण को नुकसान हुआ होगा उतना इस कंपनी को देना होगा। यानी कि पर्यावरण की नुकसान की भरपाई के लिए 200 करोड़ से ज्यादा का भी दंड लगाया जा सकता है।

आरोपों के साढ़े पांच साल बाद अब पर्यावरण मंत्रालय का कहना है कि इस प्रोजेक्ट से किसी भी पर्यावरण को किसी भी तरह का नुकसान नहीं हुआ है।

क्या है प्रोजेक्ट ?

वाटर फ्रंट डेवलपमेंट प्रोजेक्ट के तहत अडानी कि कंपनी द्वारा 4 पोर्ट्स पर निर्माण प्रक्रिया हो रही थी । 2012 में जब पर्यावरण उल्लंघन का आरोप लगा और गुजरात हाईकोर्ट ने इस पर सवाल किया तो केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने एक कमेटी का गठन किया कि मामले में पर्यावरण को नुकसान हुआ है या नहीं।

सुनीता नारायण की अगुवाई में कमेटी ने निष्कर्ष दिया कि कंपनी ने कई हरित मानकों को भारी नुकसान पहुंचाया है, इससे पर्यावरण क्षतिग्रस्त हुआ है। साथ ही कमेटी ने एक पोर्ट पर कंपनी के बैन लगाए जाने का सुझाव भी दिया था और कहा कि या तो 200 करोड़ का फाइन लगाएं या पूरे प्रोजेक्ट की कीमत का 1% पर्यावरण की भरपाई के लिए दिया जाए ।

कमिटी ने यह भी सुझाव दिया कि कंपनी की कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (CSR) खर्च से ज्यादा का फाइन लगाया जाए।

तत्कालीन यूपीए सरकार ने इन सुझावों को मान लिया और कंपनी को नोटिस देते हुए कहा कि उस पर ये फाइन क्यों ना लगाया जाए।

इस पर कंपनी ने अपनी सफाई दिया तो सभी तरह की प्रतिक्रियाओं का पर्यावरण मंत्रालय ने इंतजार किया और जनवरी 2014 में निष्कर्ष दिया कि इस प्रोजेक्ट से पर्यावरण को नुकसान हुआ है और इस पर फाइन लगाना जरूरी है।

हालांकि अप्रैल 2014 में यूपीए की ही सरकार इस बात से आशंकित थी कि सरकार द्वारा कंपनी पर फाइन लगाना कहीं न्यायिक प्रक्रिया को चुनौती तो नहीं है लेकिन मोदी सरकार आने के बाद पहले तो 2015 में फाइन लगाने से इनकार किया गया और अब कहा जा रहा है कि पर्यावरण को किसी भी तरह से नुकसान ही नहीं पहुंचाया गया था।