UN की रिपोर्ट : दलित महिलाओं का औसत जीवन मात्र 39 साल है जबकि सवर्ण महिलाओं का 54 साल
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UN की रिपोर्ट : दलित महिलाओं का औसत जीवन मात्र 39 साल है जबकि सवर्ण महिलाओं का 54 साल

भारत में दलितों की स्थिति बेहद चिंताजन है। आज भी जाति के नाम पर भेदभाव और छूआछूत जैसी प्रथा चलन में है। इन सब के बीच एक नया शिगूफा छोड़ दिया गया कि समाज से जातिवाद खत्म हो चुका है इसलिए दलितों को किसी तरह की विशेषाधिकार नहीं मिलनी चाहिए।

लेकिन सच्चाई आज भी वही है जो 100 साल पहले थी। आज भी समाज में जाति के नाम पर काम बटे हुए, आज भी में जाति के नाम पर गांव और मोहल्ले बटे हुए हैं। ऐसे में जातिवाद खत्म होने का दावा खोखला और धूर्तता भरा है।

16 फरवरी के इंडियन एक्सप्रेस में यूएन की एक रिपोर्ट छपी है। ये रिपोर्ट जाति के दंश को और भी व्यापक रूप से प्रदर्शित कर रही है। रिपोर्ट बताती है कि भारत में एक महिला की जाति उसके मृत्यु दर के जोखिम को बढ़ा देता है।

यूएन की इस रिपोर्ट के मुताबिक भारत में औसतन दलित महिलाओं की मृत्यु किसी सवर्ण महिलाओं से बहुत जल्दी हो जाती है।

तथाकथित उच्च जाति की महिलाओं की तुलना में दलित महिलाओं की मृत्यु की औसत आयु 14.6 वर्ष से कम है। यानी औसतन एक दलित महिला की मृत्यु 39.5 साल की उम्र तक हो जाती है जबकी उच्च जाति की महिलाएं 54.1 साल की उम्र तक जीवित रहती हैं।

रिपोर्ट में इसकी वजह भी बताई गई है। रिपोर्ट के मुताबिक दलित महिलाओं स्वच्छ वातावरण नहीं मिल पाता है, साथ ही अपर्याप्त जल आपूर्ति भी बड़ा कारण है। समाज का सामंति वर्ग दलित महिलाओं को नौकर से ज्यदा कुछ नहीं समझता। ज्यादातर दलित महिमा दूसरों के घर में साफ सफाई का काम करती हैं।

सरकार विभागों में भी सफाईकर्मी दलित ही होते हैं। ऐसे में दलित महिलाओं का गंदगी में रहना मजबूरी भी है। यही वजह है कि ये अपने स्वास्थ्य का भी ध्यान नहीं रख पाती और मृत्यु दर में इनका अनुपात बढ़ता जा रहा है। समाज का एक वर्ग बिल्कुल भी नहीं चाहता की दलितों को बराबरी का अधिकार मिले।