दलित ‘हिंदू’ नहीं होते, सरकार की इस आवाज को ‘मीडिया’ ने आप तक पहुंचा दिया
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दलित ‘हिंदू’ नहीं होते, सरकार की इस आवाज को ‘मीडिया’ ने आप तक पहुंचा दिया

भीमा-कोरेगांव में चल रहे जातीय हिंसा की मीडिया कवरेज से दलित समुदाय के लोगों को सबक लेना चाहिए। मीडिया के माध्यम से सरकार ने अपने मन की बात को बता दिया है।

कल एबीपी न्यूज के हिंदी न्यूज वेब पोर्टल ने खबर लगाई कि ‘पुणे: अंग्रेजों की जीत का जश्न मनाने पर हिंदुओं-दलितों के बीच हिंसा, एक की मौत, कई गाड़ियां जलाई’

दलित हिंदू नहीं होते, सरकार की इस आवाज को मीडिया ने आप तक पहुंचा दिया। अब दलित समाज को सतर्क हो जाना चाहिए। कोई अगर हिंदू उन्हें बताकर वोट मांगे तो तुरंत उससे दूर हो जाना ही बेहतर होगा। अब सवर्ण प्रभुत्व भारतीय समाज ये खुले तौर पर स्वीकार रहा है कि दलित ‘हिंदू’ नहीं होते। दलितों को अब अपने लिए किसी दूसरे विकल्प की तलाश करनी चाहिए।

गौरतलब है कि एक जनवरी, 2018 की सुबह जब पूरी दुनिया नए साल का स्वागत कर रही थी ठीक उसी वक्त बीजेपी शासित महाराष्ट्र के पुणे में दलित समुदाय के लोग भगवा गुंडों से अपनी जान बचा रहे थे।

दरअसल 1 जनवरी 1818 को दुनिया भर में दलित समाज के शौर्य की गाथा लिखी गई थी। क्योंकि इसी दिन अछूत माने जाने वाले महारों से बने एक रेजिमेंट यानी महार रेजिमेंट ने 28,000 मनुवादी पेशवाओं को धूल चटा दी थी। हर साल इसी को जश्न मनाने दलित समाज के लाखों लोग पुणे के कोरेगांव में इकठ्ठा होते हैं।

लेकिन इस साल के जश्न में भगवा गुंडों ने दंगा कर दिया। हाथ में केसरिया झंडा लिए अराजकतत्व ने कई गाड़ियों को आग के हवाले कर दिया। दलित समुदाय के लोगों के साथ मारपीट भी की। इस घटना में एक व्यक्ति की मौत भी हो गई है।