जो लोग ‘गाँधी’ का नहीं ‘गोडसे’ का हिंदुस्तान चाहते थे उनका सपना पूरा हो रहा है ! देश कट्टर हो रहा है
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जो लोग ‘गाँधी’ का नहीं ‘गोडसे’ का हिंदुस्तान चाहते थे उनका सपना पूरा हो रहा है ! देश कट्टर हो रहा है

गाँधी और गोडसे यह दो ऐसे नाम हैं जिनके कन्धों पर आज हिंदुस्तान की वर्तमान राजनीती आगे बढ़ रही है। यह दोनों नाम अपने आपमें नाम होते हुए भी दो विचारधाराओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। ‘गाँधी’ के लोग हिंदुस्तान में अहिंसा और भाईचारा चाहते हैं लेकिन ‘गोडसे’ के लोग देश की आपस में जोड़ने वाली ‘नसों’ को तहस-नहस करने पर उतारू हैं।

आज जिस तरह से देश के अलग-अलग हिस्सों में गौ रक्षा, धर्म, लव-जिहाद के नाम पर मार-काट हो रही है वो निश्चित तौर पर लोगों के बीच दूरियां पैदा कर रही है। यह देश की आने वाली नस्लों को एक टूटा हुआ भारत सौपेंगा!

राजस्थान के राजसमंद में लव-जिहाद का नाम देकर मजदूर मोहम्मद अफराजुल की निर्मम हत्या की गई। अगर यह घटना हत्यारे शम्भूलाल रैगर तक सीमित होती तो न्यायालय सुनवाई कर सकता था।

लेकिन राजनैतिक ‘शह’ पाए 200 लोगों की उत्पाती भीड़ ने शुक्रवार को उदयपुर कोर्ट के गुम्बद पर ‘भगवा’ झंडा फहरा कर देश की न्याय व्यवस्था को चुनौती दी है। सोशल मीडिया पर शम्भूलाल के समर्थन में जो लोग आ रहे हैं और उसके कदम को सही ठहरा रहे हैं, यही कदम ‘गोडसे’ के सपने को पूरा कर रहा है।

भारत आज़ादी के समय ‘गाँधी’ और ‘गोडसे’ का दंश झेल चुका है। इसका जीता जागता प्रमाण पाकिस्तान और हिंदुस्तान हैं। अब आज़ादी के 70 साल बाद हिंदुस्तान फिर से देश के दो फाड़ होने की राह पर चल पड़ा है।

अखलाक, पहलू खान, जुनैद खान की हत्या और ऊना, यूपी, बिहार, मध्यप्रदेश में दलितों पर हो रहे अत्याचार की घटनाओं ने इन उपेक्षित तबकों में डर का माहौल पैदा कर दिया है।

हम बहुत स्पष्ट देख सकते हैं कि मुसलमानों और दलितों के साथ जहाँ भी ऐसी घटनाएँ हो रही हैं वो सभी बीजेपी शासित राज्य हैं। यह बड़ा सवाल है कि इन घटनाओं में शामिल होने वाले लोग और उनके ‘उपनाम’ क्या हैं? क्या यह एक सोची समझी रणनीती के तहत दलित और ओबीसी समाज के लोगो को आगे किया जा रहा है।

अगर यह किसी रणनीती के तहत है तो देश के लिए आने वाले समय में घातक सिद्ध होगा। जो लोग ‘गाँधी’ का नहीं ‘गोडसे’ का हिंदुस्तान चाहते थे उनका सपना पूरा हो रहा है?