मोदी कहते हैं ‘बेईमान लोग मुझसे नाराज हैं’ लेकिन सच ये है कि सारे बेईमान उनके साथ आ रहे हैं, समझौता हो गया है : अभिसार शर्मा
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मोदी कहते हैं ‘बेईमान लोग मुझसे नाराज हैं’ लेकिन सच ये है कि सारे बेईमान उनके साथ आ रहे हैं, समझौता हो गया है : अभिसार शर्मा

वरिष्ट पत्रकार अभिसार शर्मा ने अपने फेसबुक लाइव के ज़रिए इस बार पैराडाइज़ पेपर्स और उसपर प्रधानमंत्री के मौनव्रत पर सवाल उठाया।

उन्होंने पैराडाइज़ पेपर्स में नाम आने पर बीजेपी सांसद आरके सिन्हा के ‘मौनव्रत’ को लेकर कहा कि यह मौनव्रत आरके सिन्हा का नहीं बल्कि ये प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का मौनव्रत है।

अभिसार ने पीएम के 2014 के उन वादों को याद दिलाया जिसमें उन्होंने कहा था “बहुत हुआ भ्रष्टाचार का वार, अबकी बार मोदी सरकार।” लेकिन पीएम के तमाम वादे धीरे-धीरे जुमले साबित होते चले गए हैं ।

प्रधानमंत्री के कश्मीर में दिए उस बयान को याद दिलाया जिसमें उन्होंने कहा था ‘ना खाऊंगा और ना खाने दूंगा’।

हिमाचल प्रदेश में एक रैली के दौरा पीएम ने भ्रष्टाचार को लेकर एक और बात कही है कि ‘बेईमान लोग मुझसे नाराज़ हैं वो मुझसे बदला लेना चाहते हैं।’ आलम यह है कि पीएम मोदी बेईमान लोगों से इतना तन्हा महसूस कर रहे हैं कि सुखराम, नारायण राणे और मुकुल रॉय जैसे भ्रष्टाचारियों को अपनी पार्टी में शामिल कर लिया। बीजेपी ने मुकुल रॉय को शामिल करके शारदा चिटफण्ड के 17 लाख पीड़ित लोगों के साथ दगाबाजी की है।

अभिसार शर्मा ने आगे कहा कि भ्रष्टाचार पर ना खाऊंगा और ना खाने दूंगा’ कहने वाले पीएम मोदी जनता के साथ धोखा कर रहे हैं। उन्हें ऐसे नारे देने का क्या अधिकार है?

क्या पीएम के जुमले पर जनता उन्हे कठघरे में खड़ी नहीं कर सकती? प्रधानमंत्री और बीजेपी ने अपने सिद्धांतों से कैसे समझौता कर लिया?

आगे अभिसार ने कहा कि सबसे बड़ा प्रश्न तो जनता से है कि उनके सामने देश में यह सब चीज़े हो रही है लेकिन जनता को कोई हैरत नहीं हो रही है!

2014 की एक रैली में नरेन्द्र मोदी ने कहा था कि “क्या ईमानदारी से राजनीति नहीं हो सकती है क्या’? लेकिन सुखराम, नारायण राणे और मुकुल रॉय को बीजेपी में शामिल करके पीएम ने खुद ही अपनी बात को जुमला साबित किया है। अभिसार ने कहा कि यही बीजेपी का चाल और चरित्र है।

अभिसार ने वरिष्ट पत्रकार अजीत अंजुम के ब्लॉग का हवाला देते हुए कहा कि 2004 में डीपी यादव के बीजेपी में शामिल होने पर कैसे पार्टी को अाडवाणी और सुषमा स्वराज की नाराज़गी झेलनी पड़ी थी और डीपी यादव को बीजेपी में शामिल नहीं किया गया और 2012 में बीएसपी नेता बाबू सिंह कुशवाहा के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ था।

उन्होंने कहा कि सवाल उस शोर के ना उठने का है जो ऐसे मौकों पर उठा करते थे पार्टी के भीतर से मीडिया से और समाज से। मेरा देश वाकई बदल रहा है जहाँ आक्रोश असल मुद्दों पर नहीं है ।