राफेल मामला : 95% पूरा होने के बाद क्यों तोड़ा मोदी सरकार ने पुराना विमान समझौता?
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राफेल मामला : 95% पूरा होने के बाद क्यों तोड़ा मोदी सरकार ने पुराना विमान समझौता?

राफेल डील को लेकर मोदी सरकार घिरती जा रही है। सामने आ रही नई जानकारी ये साबित कर रही है कि सरकार पर लगाए जा रहे आरोप निराधार नहीं हैं।

मोदी सरकार ने इस मामले में अपना पक्ष रखते हुए ये कहा था कि उसने यूपीए सरकार के समय हुआ समझौता इसलिए खत्म किया क्योंकि उसमें ज़्यादा समय लग रहा था और भारतीय वायुसेना को जल्द ही जहाज़ों की ज़रूरत है। लेकिन अब पता चला है कि पुराना समझौता लगभग 95% पूरा हो चुका था।

क्या है मामला

राफेल एक लड़ाकू विमान है। इस विमान को भारत फ्रांस से खरीद रहा है। कांग्रेस ने मोदी सरकार पर आरोप लगाया है कि मोदी सरकार ने विमान महंगी कीमत पर खरीदा है जबकि सरकार का कहना है कि यही सही कीमत है। ये भी आरोप लगाया जा रहा है कि इस डील में सरकार ने उद्योगपति अनिल अम्बानी को फायदा पहुँचाया है।

बता दें, कि इस डील की शुरुआत यूपीए शासनकाल में हुई थी। कांग्रेस का कहना है कि यूपीए सरकार में 12 दिसंबर, 2012 को 126 राफेल राफेल विमानों को 10.2 अरब अमेरिकी डॉलर (तब के 54 हज़ार करोड़ रुपये) में खरीदने का फैसला लिया गया था। इस डील में एक विमान की कीमत 540 करोड़ थी।

इनमें से 18 विमान तैयार स्थिति में मिलने थे और 108 को भारत की सरकारी कंपनी, हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल), फ्रांस की कंपनी ‘डासौल्ट’ के साथ मिलकर बनाती। 2015 में मोदी सरकार ने इस डील को रद्द कर इसी जहाज़ को खरीदने के लिए नई डील की।

नई डील में एक विमान की कीमत लगभग 1640 करोड़ होगी और केवल 36 विमान ही खरीदें जाएंगें। नई डील में अब जहाज़ एचएएल की जगह उद्योगपति अनिल अम्बानी की कंपनी बनाएगी। साथ ही टेक्नोलॉजी ट्रान्सफर भी नहीं होगा जबकि पिछली डील में टेक्नोलॉजी भी ट्रान्सफर की जा रही थी।

क्यों तोड़ा गया समझौता

जनता के रिपोर्टर की एक खबर के मुताबिक, जब मोदी सरकार ने पुराना समझौता खत्म किया तब वो 95% पूरा हो चुका था। 25 मार्च 2015 को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान, डासौल्ट के सीईओ एरिक ट्रेपियर ने भी ये बात कही थी। उन्होंने ये भी बताया था कि समझौते के लिए ही वो दो हफ्ते बाद भारत जा रहे हैं।

इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में भारत के हाईकमिश्नर और भारतीय वायुसेना के अधिकारी भी मौजूद थे। लेकिन पीएम मोदी ने 10 अप्रैल 2015, को ही पुराना समझौता खत्म कर दिया।

सवाल ये उठता है कि जब 95% समझौता पूरा हो गया था और फ़्रांस से अधिकारी भारत आने ही वाले थे तो ऐसी क्या ज़रूरत पड़ गई कि इतनी जल्दी पुराना समझौता तोड़कर नए समझौते पर हस्ताक्षर किये गए।