गरीबों पर सख्त मोदी सरकार अमीरों पर मेहरबान ! उद्योगपतियों का 55 हजार करोड़ लोन ठण्डे बस्ते में डाला
BH firstpost

गरीबों पर सख्त मोदी सरकार अमीरों पर मेहरबान ! उद्योगपतियों का 55 हजार करोड़ लोन ठण्डे बस्ते में डाला

किसानों के क़र्ज़ को बोझा बताकर उद्योगपतियों को रियायत दे रही सरकारी नीतियों से देश की अर्थव्यवस्था तक के लिए खतरा पैदा हो रहा है। भारत के सरकारी बैंकों ने वित्तीय वर्ष 2017-18 की पहली छमाही में बड़े उद्योगपतियों द्वारा लिए गए 55 हजार 356 करोड़ रुपये के लोन को ठंडे बस्ते में डाल दिया है।ये खुलासा इंडियन एक्सप्रेस द्वारा आरबीआई से सूचना के अधिकार के तहत ली गई जानकारी से हुआ है।

एक तरफ देश में किसानों का कर्ज़ माफ़ करने के लिए राजनीतिक रोटियां सेकी जाती हैं। उसके बाद भी कर्ज़ माफ़ी के नाम पर पांच-सात रुपये माफ़ किये जाते हैं। बैंकों के अध्यक्ष इसको भी अर्थव्यवस्था के लिए घातक बताते हैं।

लेकिन पूंजीपतियों का कर्ज़ ठंडे बसते में डालने के लिए बिना राजनीति और अर्थव्यवस्था का ज्ञान दिए सब राज़ी हो जाते हैं। इससे पता चलता है कि हमारे सरकारी तंत्र से लेकर राजनीति तक में पूंजीपतियों कितनी पैठ है।

मोदी सरकार समय-समय पर इन कर्ज़दारों से कर्ज़ वसूलने की बता करती रही है लेकिन उसके राज में अब उल्टा इन कर्ज़दारों का ज़्यादा कर्ज़ ठंडे बस्ते में डाला जा रहा है।

क्या है कर्ज़ ठंडे बसते में डालना?

कर्ज़ को ठंडे बसते में डालना राइट ऑफ, कहलाता है। पिछले साल भी 35 हज़ार 985 करोड़ रुपये राईट ऑफ़ किये गए थे। इस बार राशि 55% और बढ़ गई है। रिज़र्व बैंक ने इस प्रक्रिया को समझाते हुए कहा है कि बैंकों द्वारा एनपीए (फंसा हुआ कर्ज़) यानी की गैर लाभकारी संपत्तियों को राइट ऑफ करना एक सामान्य प्रक्रिया है। बैंक अपने बैलेंस शीट को साफ सुथरा बनाने के लिए ऐसा करते हैं। मतलब बैंकों का लेनदेन घाटे में होते हुए भी दस्तावेज़ों में घाटे में नहीं दिखता है।

अर्थव्यवस्था के लिए घातक

हालांकि आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है कि हर साल आप लोन को राइट ऑफ नहीं कर सकते हैं। उन्होंने कहा, ‘ आप ऐसे लोन को हर तिमाही में या हर साल क्लियर नहीं कर सकते हैं, ये पांच या दस साल में की जाने वाली प्रक्रिया है। इसके अलावा राइट ऑफ की जाने वाली रकम भी छोटी होनी चाहिए। ऐसा नहीं होने पर राइट ऑफ की प्रक्रिया पारदर्शी नहीं रह जाती है।’

इस तरह लगातार हज़ारों करोड़ के लोन को ठंडे बस्ते में डालते रहना अर्थव्यवस्था के लिए घातक है। जब कर्ज़ लेने वालों से पैसा वसूला नहीं जाएगा और उसे लगातार ठंडे बसते में डाल दिया जाएगा तो ठंडे बस्ते में जाने वाला वाली रकम एक दिन बहुत ज़्यादा बढ़ जाएगी। अगर तब फिर तो ये कर्ज़दार अपने हाथ खड़े कर लेंगे या भाग भी सकते हैं।

विजय माल्या के ऊपर भी लगभग 9 हज़ार करोड़ का कर्ज़ था जिसे बिना चुकाए वो विदेश भाग गए। अब उनकी भारत में संपत्ति 1000 करोड़ की भी नहीं है। इसलिए बैंकों को बड़ा नुकसान हुआ है। 2008 में अमेरिका में इसी तरह की स्थिति ने वहां की अर्थव्यवस्था को गिरा दिया था।