भागलपुर को मुस्लिमों की कर्बला बनाने वाले केएस द्विवेदी बने बिहार के नए DGP, जानिए क्या है विवाद
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भागलपुर को मुस्लिमों की कर्बला बनाने वाले केएस द्विवेदी बने बिहार के नए DGP, जानिए क्या है विवाद

बिहार में इस समय राज्य के नए महानिदेशक (डीजी) की नियुक्ति पर कई सवाल उठ रहे हैं। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने आईपीएस अधिकारी केएस द्विवेदी को बिहार पुलिस के नए डीजीपी के रूप में नियुक्त किया है। ये सवाल भाजपा समर्थित सरकार की मंशा पर उठ रहे हैं।

क्या है विवाद

इस विवाद के तार राज्य में 1989 में हुए भागलपुर दंगे से जुड़े हैं। उस दंगे के समय केएस द्विवेदीज़िले के पुलिस अधीक्षक यानि एसपी थे।

1989 में 24 अक्टूबर से 23 दिसंबर तक भागलपुर शहर और इसके आसपास बसे करीब 200 गांवों के 11,500 घर सांप्रदायिक दंगों की आग में पूरी तरह झुलस गए थे। इनमें सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 1070 लोगों को जान गंवानी पड़ी थी, जिनमें करीब 900 मुस्लिम समुदाय के थे।

इसके अलावा करीब 50,000 लोगों को अपना घर-बार छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा था। दंगों के दौरान 68 मस्जिदों के साथ 20 मज़ारों को भी बर्बाद किया गया। मुसलमानों के आजीविका प्रमुख आधार को खत्म करने की कोशिश की गई थी।

दंगे के बाद बिहार सरकार द्वारा गठित जांच आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि केएस द्विवेदी सहित कई पुलिस अधिकारी दंगा रोकने में विफल रहे। साथ ही, उन्हें मुस्लिम समुदाय के खिलाफ ‘सांप्रदायिक सोच’ रखने वाला बताया गया था।

जांच आयोग के मुताबिक 1989 में दंगों से पहले मुहर्रम के मौके पर एसके द्विवेदी ने एक विवादास्पद बयान दिया था कि वे स्थानीय मुसलमानों का कत्लेआम करके भागलपुर को एक और करबला बना देंगे। इसके बाद ज़िला मजिस्ट्रेट ने उनसे माफी मांगने को कहा था।

शोधकर्ता और कानूनी कार्यकर्ता वारिशा फरासत व वकील प्रीत झा द्वारा लिखित किताब ‘स्पलिंटर्ड जस्टिस : लिविंग द हॉरर ऑफ मास कम्युनल वॉयलेंस इन भागलपुर एंड गुजरात’ में इन दंगों के दौरान पुलिस की भूमिका पर विस्तार से लिखा गया है।

इस किताब में दंगों की त्रासदी को झेलने वाले पीड़ितों के साथ बातचीत के हवाले से कहा गया है कि पुलिस ने दंगाइयों के साथ मिलकर एक विशेष समुदाय के खिलाफ काम किया। कई पीड़ितों ने तो यह भी कहा कि उन्होंने पुलिस अधिकारियों को दंगाइयों को उकसाते हुए देखा था। उनका यह भी कहना था कि केएस द्विवेदी दंगाइयों की मदद कर रहे थे।

राजीव गाँधी ने किया था सस्पेंड

दंगों के दौरान भागलपुर दौरे पर आए तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने तत्काल प्रभाव से केएस द्विवेदी को हटाने का फरमान सुनाया था। हालांकि, इसके बाद बड़े पैमाने पर विश्व हिंदू परिषद और अन्य हिंदू संगठनों द्वारा इस आदेश का विरोध करने पर उन्हें इस फैसले को वापस लेना पड़ा था और केएस द्विवेदी अपने पद पर बने रहे थे।

राजनीतिक माईने

राज्य की प्रमुख विपक्षी पार्टी राष्ट्रीय जनता दल (राजद) ने केएस द्विवेदी की नियुक्ति पर सवाल उठाया है। पार्टी का कहना है कि राज्य की नीतीश कुमार सरकार ने भाजपा और इसके पितृ संगठन आरएसएस के कहने पर यह कदम उठाया है।

राजद के राष्ट्रीय प्रवक्ता मनोज झा ने कहा, ‘ये फैसला साफतौर पर नागपुर (संघ मुख्यालय) द्वारा लिया गया है और इसे पटना पर थोपा गया है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपनी राजनीतिक सहयोगी भाजपा से प्रेरित होकर काम कर रहे हैं।’

इस नियुक्ति की खबर आने के बाद सोशल मीडिया पर आई लोगों की प्रतिक्रिया बताती है कि नीतीश सरकार के इस फैसले ने भागलपुर दंगों के पीड़ितों के दर्द को एक बार फिर उभार दिया है। ये फैलसा राज्य के मुस्लिम समाज को जेडीयू से दूर कर सकता है। साथ ही उन लोगों को भी जो राज्य में हिन्दू-मुस्लिम भाईचारा बनाए रखना चाहते हैं।

बिहार हिन्दू-मुस्लिम एकता के लिए जाना जाता रहा है लेकिन फिर से भाजपा के सहयोग से सरकार बनने के बाद राज्य में सांप्रदायिक घटनाओं में बढ़ोतरी हुई है। प्रदेश में गाय के नाम पर मोब लिंचिंग की घटनाएँ भी देखी गई हैं। जो अभी तक बिहार में नहीं हो रही थी।

इस नियुक्ति ने खुद को धर्मनिरपेक्ष कहने वाले नीतीश कुमार की छवि पर भी कई सवाल खड़े कर दिए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि नीतीश कुमार लम्बे समय तक भाजपा के समर्थन से सरकार चलाई है लेकिन अब हालत बदल गए हैं।

इस समय नीतीश कुमार पर भाजपा का दबाव ज़्यादा है। सरकार के फैसलों में भाजपा का दखल बढ़ता जा रहा है। इसीलिए नीतीश कुमार पहले की तरह सरकार नहीं चला पा रहे हैं और इस तरह के फैसले सरकार ले रही है।