कलाम के समय में ‘मुसलमानों’ को औऱ कोविंद के समय में ‘दलितों’ को क्यों मारा जा रहा है ?
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कलाम के समय में ‘मुसलमानों’ को औऱ कोविंद के समय में ‘दलितों’ को क्यों मारा जा रहा है ?

ये एक बहुत ही वाजिब सवाल है कि एपीजे कलाम के समय में मुसलमानों को औऱ रामनाथ कोविंद के समय में दलितों क्यों मारा जा रहा है? जिस तरह की धर्म और जाति आधारित राजनीति भारत में होती है उस नज़रिए से ये सवाल बिल्कुल पूछा जा सकता है।

भारत में ये बहुत पुरानी रिवायत है कि वोट सामाजिक-आर्थिक मुद्दों से ज़्यादा धर्म और जाति के आधार पर दिया जाता है। इसी की तर्ज पर दूसरी रिवायत है कि राजनीतिक पार्टी किसी भी समाज या समुदाय के खिलाफ कुछ भी करे लेकिन स्वयं को बचाने के लिए उस समाज या समुदाय का एक मुखौटा पहन ले। यानि उसका एक नेता उस समाज से होना चाहिए।

इस तरह के उदाहरण ये देश पहले भी देख चुका है और आज भी देख रहा है। गुजरात 2002 मुस्लिम विरोधी दंगों के दौरान देश के राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम थे। उस समय सरकारी आकड़ों के अनुसार गुजरात में 1500 मुसलमान मारे गए थे।

हमारे देश में किसी राज्य में जब स्तिथि राज्य सरकार के हाथों से बाहर निकल जाए या राज्य सरकार मामला संभाल न रही हो तो राष्ट्रपति को वहां आपातकाल लगाने की शक्ति प्राप्त है लेकिन गुजरात में ऐसा कुछ नहीं हुआ।

इसी तरह हाल ही में महाराष्ट्र में एक जनवरी को भीमा-कोरेगांव में दलित समाज के द्वारा 200वी वर्षगाठ आयोजन के दौरान कुछ उग्र हिन्दू संगठनों द्वारा कथित तौर पर हिंसा की गई थी जिसके विरोध में दलित समाज ने महाराष्ट्र बंद का एलान भी किया था।

इससे पहले गुजरात में और शैक्षणिक संस्थानों में दलित विरोधी मामले सामने आए हैं। हैदराबाद विश्वविद्यालय के दलित छात्र रोहित वेमुला की मौत इसका एक उदाहरण है। ये सब तब हो रहा है जब देश के राष्ट्रपति एक दलित हैं।

हकीकत ये है कि वो दलित ज़रूर हैं लेकिन न आजतक उन्होंने उस समाज के लिए आवाज़ उठाई है न ही दलित उत्पीड़न को सही है। वो एक ऐसे दलित हैं जो एक ऐसी राजनीतिक पार्टी के साथ हैं जिसके नेता ये बात खुलेआम कहते हैं कि वो वर्णव्यवस्था और जातिवाद में विश्वास रखते हैं।

ये बात भारतीय राजनीति की हकीकत और देश की सड़ चुकी व्यवस्था को बयान करती है। शक्ति के उस खेल को दिखाती जिसका हिस्सा बनने के बाद कलाम से लेकर कोविंद तक अपने समाज की नहीं बल्कि कुर्सी की रक्षा करते हैं।

इससे भारतीय मतदाताओं को ये सीख लेनी चाहिए कि अगली बार जब वो वोट दे तो धर्म-जाति न देखकर उम्मीदवार की छवि और पार्टी के मुद्दों को देखकर उसे चुने।