हजारों मुस्लिम महिलाओं को इंसाफ दिलाने की बात करने वाले इन चार माओँ की बात क्यों नहीं करते ?
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हजारों मुस्लिम महिलाओं को इंसाफ दिलाने की बात करने वाले इन चार माओँ की बात क्यों नहीं करते ?

आज वर्ष 2017 का आखिरी दिन है। आमतौर पर इसदिन को धूमधाम से मनाया जाता है। इस बात की ख़ुशी होती है कि ये साल आराम से निकल गया और ज़िंदगी नए साल के लिए बाहे फैलाए खड़ी है। लेकिन क्या सब के लिए साल का ये आखिरी दिन इतना ही खुशनुमा है?

यू तो ये लिस्ट बहुत लम्बी है, जिसमें गरीब से लेकर सामाजिक पिछड़ापन के शिकार समेत कई लोग आते हैं लेकिन सबसे दर्दभरी दास्तान है बेबसी की। एक ऐसी स्तिथि, अपनी राजनीतिक रोटियां सेकने का एक ऐसा गंदा खेल, व्यवस्था-ताकत का ऐसा दबाव जो लोगों को बेबस बनाकर छोड़ रहा है।

वो अपने देश, अपने राज्य, अपने शहर, अपने घर में ही बेबस हो गए हैं। इन लोगों में वो माताएं हैं जिनकें बच्चों को देश में चल रहे घिनोने खेल का शिकार बनाकर मौत के घाट उतार दिया गया। ये हैं जुनैद की माँ सायरा, पहलु खान की माँ अंगूरी बेगम, अख़लाक़ की माँ असगरी, नजीब की माँ फातिमा नफीस।

गौरतलब है कि इसी वर्ष जून में हरयाणा के जुनैद की हत्या ट्रेन में गौमांस ले जाना के आरोप में कर दी गई थी। अप्रैल में राजस्थान के अलवर में पशुपालक पहलु खान की हत्या गाय तस्करी के आरोप में कर दी गई थी। सितम्बर 2015 में अख़लाक़ की हत्या घर में गौमास रखने की अफवाह पर कर दी गई थी। अक्टूबर 2016 से जेएनयू विश्वविद्यालय का छात्र नजीब अहमद एबीवीपी के लोगों से झगड़े के बाद आजतक गायब है।

इन चारों मामलों में कुछ चीज़े सामान्य हैं। इन चारों लोगों का धर्म, एक विशेष राजनीतिक विचारधारा और पार्टी की मामलों में भूमिका, पुलिस से लेकर सीबीआई तक की इन मामलों में नाकामयाबी।

उसी सीबीआई की नाकामयाबी जो विपक्ष के बड़े से बड़े नेताओं के घर छापे मारती है। समय आने पर पुराने से पुराने मामले में सबूत और गवाह निकाल लाती है लेकिन इन मामलों में सीबीआई हाथ मालती या कथित तौर पर हाथ बांधी खड़ी नज़र आई।

जब पूरी व्यवस्था ही आपके खिलाफ हो तब आप क्या कर सकते है। वो भी एक ऐसे दौर में जब व्यवस्था आपके खिलाफ होगी और उसके खिलाफ आवाज़ उठाने पर आपको देशद्रोही साबित कर दिया जाएगा।

इस बेबसी से देश में बहुत से लोग गुज़र रहे हैं। इनका सबसे बड़ा या सबसे चर्चित उदाहरण इन चारों मामलों में पीड़ितों की माताएं हैं। जिनको पूरी कोशिश के बावजूद अपने बच्चों के लिए इंसाफ भी नहीं मिल पा रहा है। क्या इनके लिए साल का ये आखिरी दिन उतना ही शानदार होगा जितना और आम लोगों के लिए है?

ये सवाल सिर्फ इन चारों को लेकर नहीं है बल्कि एक ऐसे बनते माहौल और व्यवस्था को लेकर है जिसका शिकार कोई भी कही भी हो सकता है। ऐसा नहीं है कि गाय को लेकर सिर्फ एक विशेष धर्म के लोगों पर ही हमले हुए हैं। दलित समाज इन हमलों का शिकार हुआ है। अगले वर्ष हम और आप भी इसका शिकार हो सकते हैं। हमारे साल का आखिरी दिन भी उतना ही बेबस हो सकता है।