जन्मदिन विशेष: ‘कोई दीवाना कहता है कोई पागल समझता है’ के साथ कुमार ने सभी को अपना दीवाना बनाया
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जन्मदिन विशेष: ‘कोई दीवाना कहता है कोई पागल समझता है’ के साथ कुमार ने सभी को अपना दीवाना बनाया

कुमार विश्वास हिन्दी के एक अग्रणी कवि तथा सामाजिक-राजनैतिक कार्यकर्ता हैं। कविता के क्षेत्र में श्रृंगार के गीत इनकी विशेषता है। साल 1994 में राजस्थान के एक कॉलेज में व्याख्याता (लेक्चरर) के रूप में अपने करियर की शुरुआत करने वाले डॉक्टर कुमार विश्वास एक दिन प्रसिद्ध हिंदी कविता मंच का चेहरा बनेंगे ये किस ने सोचा होगा।

कुमार विश्वास का जन्म 10 फ़रवरी 1970 को पिलखुआ, (ग़ाज़ियाबाद, उत्तर प्रदेश) में हुआ था। इनके पिता चाहते थे कि कुमार इंजीनियर बनें। लेकिन इनका इंजीनियरिंग की पढ़ाई में मन नहीं लगता था। वह कुछ अलग करना चाहते थे, इसलिए उन्होंने बीच में ही इंजीनियरिंग छोड़ दी।

चार भाईयों और एक बहन में सबसे छोटे कुमार विश्वास ने साहित्य के क्षेत्र में आगे बढ़ने के ख्याल से स्नातक और फिर हिन्दी साहित्य में स्नातकोत्तर किया, जिसमें उन्होंने स्वर्ण-पदक प्राप्त किया। तत्पश्चात उन्होंने “कौरवी लोकगीतों में लोकचेतना” विषय पर पीएचडी की। उनके इस शोधकार्य को वर्ष 2001 में पुरस्कृत भी किया गया। उनके इस शोधकार्य को वर्ष 2001 में पुरस्कृत भी किया गया।

कवि सम्मेलनों और मुशायरों के अग्रणी कवि कुमार विश्वास अच्छे मंच संचालक भी माने जाते हैं। देश के कई शिक्षण संस्थानों में भी इनके एकल कार्यक्रम होते रहे हैं। कुमार की लोकप्रिय कविताएं हैं- ‘कोई दीवाना कहता है’, ‘तुम्हें मैं प्यार नहीं दे पाऊंगा’, ‘ये इतने लोग कहां जाते हैं सुबह-सुबह’, ‘होठों पर गंगा है’ और ‘सफाई मत देना’।

कुमार विश्वास युवाओं के बीच बहुत लोकप्रिय हैं। कॉलेज कवी सम्मेलनों में युवा उनकी कविताओं और बीच में उनकी चुटकी लेने की आदत पर तालियाँ और सीटियाँ बजाते नहीं थकते।

कुमार विश्वास अगस्त 2011 के दौरान जनलोकपाल आंदोलन के लिए गठित टीम अन्ना के एक सक्रिय सदस्य रहे हैं। वह 26 नवम्बर 2012 को गठित आम आदमी पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य हैं। कुमार विश्वास ने वर्ष 2014 में अमेठी से राहुल गांधी और स्मृति ईरानी के खिलाफ लोकसभा चुनाव लड़ा था, जिसमें बाजी नहीं मार पाए।

इस समय कुमार विश्वास पार्टी की तरफ से राजस्थान में ज़िम्मेदारी संभाल रहे हैं। पिछले कुछ समय से उनकी ‘आप’ सुप्रीमो अरवींद केजरीवाल से तनातनी भी चल रही है। इस सब के बाद भी न कुमार की आवाज़ में विरोध कम हुआ है न ही विरोध जताने का तरीका बदला है। आज भी वो मीडिया के सामने कुछ पंक्तिया कहकर राजनीतिक गलियारों में शोर मचा देते हैं।