किसान दिवस विशेष : अन्नदाताओं पर गोली चलाने वाले नेताओं को अब किसानों की शक्ति का अंदाजा नहीं है
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किसान दिवस विशेष : अन्नदाताओं पर गोली चलाने वाले नेताओं को अब किसानों की शक्ति का अंदाजा नहीं है

किसानों के हमदर्द : चौधरी चरण सिंह आज किसानों के हमदर्द चौधरी चरण सिंह (23.12.1902 – 29.05.87) का 115वां जन्मदिन है। वे भारत के 5वें प्रधानमंत्री (28.07.79 – 14.01.80) थे। इसके पहले वे थोड़े-थोड़े वक़्त के लिए दो बार उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री (3.4.67 – 25.2.68, & 18.2.70 – 1.10.70) और मोरारजी के मंत्रिमंडल में हिन्दुस्तान के गृहमंत्री, वित्तमंत्री और उपप्रधानमंत्री रहे।

चौधरी साहब और दो बार भारत के उपप्रधानमंत्री रहे ताऊ देवीलाल, दो ऐसे किसान नेता हुए जिनकी जनता के बीच ज़बरदस्त पैठ थी। यह किसानों की ही ताक़त थी कि चौधरी साहब और ताऊ द्वारा वोटक्लब पर दो रैली कर देने से हिन्दुस्तान का शासन हिलने लगता था। सही मायने में वे जननेता थे।

अन्नदाताओं पर गोली चलवाने वाली आज की हुकूमत को किसानों की शक्ति का अंदाजा नहीं है। आज भी ग्राम्य अर्थव्यवस्था मुख्यतः कृषि और पशुपालन पर निर्भर है। संस्कृति की बात करने वाले शायद भूल गए हैं, “There’s no culture without agriculture”. एक बार जब बतौर प्रधानमंत्री चरण सिंह बिहार के सादगीपसंद मुख्यमंत्री कर्पूरी जी के घर समस्तीपुर गए तो दरवाज़ा इतना छोटा था कि चौधरी जी को सर में चोट लग गई। चरण सिंह ने कहा, “कर्पूरी, इसको ज़रा ऊंचा करवाओ।”

ठाकुर जी बोलते थे कि जब तक बिहार के ग़रीबों का घर नहीं बन जाता, मेरा घर बन जाने से क्या होगा? रौब भी चौधरी साहब का उतना ही था, खगड़िया की एक सभा को वो संबोधित कर रहे थे, कर्पूरी जी ने बीच में उन्हें कुछ याद दिलाना चाहा, तो चरण सिंह ने हाथ पकड़ कर उन्हें बिठा दिया। वो जिन्हें मानते थे, उन पर हक़ भी समझते थे और स्नेह भी लुटाते थे।

80 के दशक में इंदिरा गांधी की दुखद मौत के बाद सहानुभूति में उपजी राजीव लहर में बड़े-बड़े दिग्गज चुनाव हार चुके थे, आलम यह था कि मुख्य विपक्षी पार्टी तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) थी। बिजनौर सीट जब खाली हुई, तो उपचुनाव में रामविलास पासवान को बिहार से लाकर लड़वाया। हालांकि, मायावती, मीरा कुमार और पासवान के बीच हुए त्रिकोणीय मुक़ाबले में मीरा कुमार ने तक़रीबन 5 हज़ार वोटों से पासवान को हरा दिया।

इससे पहले चरण सिंह ने संजय की मौत के बाद खाली हुई अमेठी सीट से राजीव गांधी के ख़िलाफ़ समूचे विपक्ष के उम्मीदवार के रूप में शरद यादव को मध्यप्रदेश से लाकर चुनाव लड़वाया। उनसे चौधरी साहब ने कहा कि हार-जीत की परवाह किए बगैर जाकर जमके लड़ो, बड़े मुक़ाबले में ज़्यादा मज़ा आएगा।

शरद जी के ड्रॉइंग रूम में बस चरण सिंह की तस्वीर आपको मिलेगी। वो उन्हें अपना राजनीतिक गुरु मानते हैं।

लालू, शरद, मुलायम, पासवान जैसे नेताओं के आगे बढ़ने का एक कारण यह भी था कि उनके दौर में लोहिया, जेपी, चरण सिंह, कर्पूरी ठाकुर, ताऊ देवीलाल जैसे उदार नेता थे जो तलाश कर, तराश कर नयी रोशनी को निखरने का भरपूर मौक़ा देते थे, बुला-बुला कर मंच प्रदान करते थे।

हर दौर में चुनाव लड़ने के लिए पैसे की ज़रूरत पड़ती रही है।

संचय-संग्रह की प्रवृत्ति, दिखावे और फिज़ूलखर्ची की प्रकृति न हो, तो कम पैसे में भी चुनाव लड़ा और जीता जा सकता है।

इसके लिए नेता का अंदर-बाहर एक होना ज़रूरी है। तभी वह अपने कार्यकर्ताओं को भी मितव्ययिता के लिए तैयार कर पाएगा। 77 में मुंगेर से कांग्रेस के डीपी यादव के ख़िलाफ़ नरेंद्र सिंह के बाबूजी कृष्ण सिंह चुनाव लड़ रहे थे। टाउन हॉल में जेपी का कार्यक्रम तय था, पर वे किंचित कारणों से आ न सके। फिर उनके भाषण का टेप सुनाया गया। कार्यकर्ताओं ने अपने सामर्थ्य के हिसाब से योगदान दिया, जनता ने चंदे दिये।

77 के जेपी लहर में इस तरह चंदाचुटकी कर न सिर्फ़ कृष्ण सिंह जीते, बल्कि जनता अलायंस ने कुल 345 सीटें हासिल की, जिनमें बिहार में 54 में 54 और यूपी में 85 में 85 सीटें जीती।

यह भी सच है कि जनता सरकार में आंतरिक कलह जब ज़्यादा बढ़ गया, दूसरी तरफ जनसंघ वालों की दोहरी सदस्यता के सवाल पर जब विद्रोह शुरू हुआ, तो सरकार चलाने के लिए स्थिति सहज नहीं रह गई।

बाबू जगजीवन राम को प्रधानमंत्री बनाए जाने के मशवरे को न मोरारजी ने माना न चरण सिंह ने। चरण सिंह ने तो संसद भंग करने की सिफ़ारिश ही कर डाली और संपूर्ण क्रांति का नारा महज नारा बन कर रह गया।

कांग्रेस ने चरण सिंह के साथ बदमाशी यह की कि बीच में ही चंद दिनों के अंदर समर्थन वापस लेकर चरण सिंह के लिए एंबैरेसिंग सिचुएशन पैदा कर दिया और इस तरह चौधरी साहब हिन्दुस्तान के अब तक के एकमात्र ऐसे प्रधानमंत्री हुए जिन्हें कभी बतौर प्रधानमंत्री संसद सत्र में जाने का मौक़ा नहीं मिला।

मात्र 24 दिनों के अंदर उन्होंने प्रधानमंत्री के पद से इस्तीफ़ा दे दिया यह कहते हुए कि आपातकाल के दौरान हुई घटनाओं को लेकर चल रहे मुक़दमे के मामले में वो इंदिरा गांधी द्वारा ब्लैकमेल नहीं होना चाहते थे। पर, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि अपने चंद महीने के कार्यकाल में उन्होंने किसानों के हितों के लिए जो काम किए, वो अद्भुत था।

यूपी के मुख्यमंत्री के रूप में तो उनकी कल्याणकारी योजनाओं और भूमिसुधार को लेकर की गई पहल की मिसाल दी जाती है। वे कहते थे, “देश की तरक्की और ख़ुशहाली का रास्ता खेतों-खलिहानों से होकर गुज़रता है”।

67 से पहले वे कांग्रेस में सक्रिय रहे, फिर भारतीय लोकदल और जनता पार्टी में। आख़िरी दिनों में उन्होंने जनता पार्टी (सेक्युलर) का गठन कर लिया। चरण सिंह 80 में बिहार विधानसभा चुनाव के प्रचार में आते हैं। मुंगेर में एक ही सभा में 3 विधानसभाओं – हवेली खड़गपुर, मुंगेर और जमालपुर के लिए प्रचार करते हैं।

अपने अंदाज़ में वे कहते हैं, “देखो जी, ये है जयप्रकाश जादव, कल इसके यहां ठहरा हुआ था, इसके घर में टूटी खाट नहीं है अतिथियों को बैठाने के लिए। इसको जिता देना”। फिर वे रामदेव सिंह यादव को खड़ा करवा के कहते हैं, “ये देखो कई बार से कोशिश कर रहा है, भैंस बेचकर नोमिनेशन कराया है, रामदेव को जिता देना, ग़रीब-ग़ुरबों के दु:ख-दर्द को समझेगा”। अब वे उपेंद्र वर्मा की ओर मुखातिब होते हैं, और लोगों से अपील करते हैं, “इस जुझारू आदमी को जिता कर विधानसभा भेजो, तुम्हारी आवाज़ बुलंद करेगा। खेती-बाड़ी समझता है, समस्या सुलझाएगा। पैसे-कौड़ी के लालच में पड़ोगे, तो 5 साल तक तुम्हारे हितों के साथ सौदा होगा”।
तीनों उम्मीदवार जीत गए। एक दशक बीतने के बाद इन्हें न जेपी याद रहे, न लोहिया, न लिमये, न चरण सिंह, न कर्पूरी। कुछ वर्षों तक तो बहुत ठीक चला, लालू जी ने दो साल तक सिर्फ़ 10 कैबिनेट मंत्री के साथ सरकार चलाई, जिनमें एक तामझाम से अलग रहने वाले कर्पूरी जी के सुयोग्य पुत्र रामनाथ ठाकुर जी भी शामिल थे। बाद में लोगों को असंयत लोकल नेताओं की कतिपय उल-जलूल बातों से कोफ़्त होने लगी।
शोधार्थी, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली